चरवाहा और चंदा

चरवाहा और चंदा

सुबह होते ही छोटे से गांव अमर गढ़ में चहलपहल शरू हो गई । पांच बजे तो चूल्हे पर रोटी पकाने की थपाके सुनाई देने लगी । घर मे से कचरा निकल ने लगा , गायो का दोहन शरू हो गया और जैसे सोया हुआ गांव जग गया । भुवन भी जाग गया और मुंह धोकर सीधा दरवाजे पर गया । अभी थोड़ी देर है सोचकर घर मे आकर चाय बनाने बैठा । लकड़ी जलाकर उसी पर चाय की पतेली रखकर चाय बनाने लगा । लकड़ियां जल रही थी । बैठे बैठे सोच रहा था – मैं भी इसी तरह जल रहा हूं ना !!

भुवन घर मे अकेला था । पांच साल का था तब माता पिता गुजर गए । जब अपने ही समय आने पर मुंह फेर लेते है तो दुसरो को तो क्या कहे ? अकेला पड़ा भुवन गांव का हो गया । वैसे भी अकेले होने पर ज्यादातर बाहर वाला हाथ थामता है । ऐसा ही होता आया है ! भुवन को भी गांव ने थाम लिया । जैसे गांव ने उसे गोद ले लिया । बस गौधन को चराने ले जाना और शाम को आकर खाना खाकर चौराहे पर थोड़ी मटरगस्ती करके सो जाना । पिछले बारह साल से यही चल रहा था ।

चरवाहा और चंदा की प्रतीकात्मक तसवीर

अब भुवन सत्रह साल का हो गया था ।संसार कड़वा क्यो ये समझने लगा था । गौधन को चराने ले बदले गांव वाले अपनी गाय , भेड , बकरियां और दूसरे पशुधन को चराने के बदले कुछ पैसे अनाज मिल जाता था । सब चल रहा था । लेकिन तन्हाई भुवन के घर मे एक कोने में पड़ी रहती थी । जो कभी कभी उसे बहुत चुभती थी । सुबह होते ही वह निकल पड़ता । साथ मे एक छोटे से कपड़े में आटा ले लेता , साथ ही थोड़ी मिर्ची और थोड़ा नमक ! पशुधन और भुवन गांव छोड़कर जंगल की ओर चले जाते । सब जानवर मजे से पेट पूजा करता। बहने वाले झरने से पानी पी लेता । भुवन दोपहर को आग जलाकर आटे में से कच्ची पक्की रोटी बना लेता और पानी को मिर्च मे मिलाकर खा लेता । फिर से नए इलाके में जाना और शाम होते होते वापिस आकर कच्ची पक्की रोटी बनाकर खाना खाकर सोना ! और चाहिए भी क्या ? सोना ही तो सच्चा सोना है ।

लेकिन एक दिन भुवन जिंदगी में तूफ़ान आया ।

दोपहर का समय था । सब पशुओ ने पेट पूजा करके पेड़ के नीचे आराम करने बैठे थे। सिर से कपड़ा उतारकर नीचे रखकर उस पर रोटी रखकर हाथ मे रोटी के टुकड़े में मिर्च और पानी मिलाकर उसमे से निवाले खा रहा था । अभी तो उसने शरू ही किया था । दो तीन निवाले पूरे ही हुए की कही से किसी चिल्लाने की आवाज आई !

‘ बचाओ ! ‘

भुवन को हैरानी हुई । यहां कौन हो सकता है ? शायद ये उसका कोई वहम होगा ऐसा सोचकर वह फिर से निवाला लेने के लिए रोटी का टुकड़ा तोड़ा । जैसे ही खाने गया फिर से आवाज आई ।

‘ बचाओ ! ‘

नही ये वहम नही , कोई जरूर मुसीबत में है ! और उसने बची रोटी को मिर्ची के साथ मुंह मे रखा , कपड़ा उठाया और लाठी को लेकर जैसे दौड़ा !
आवाज की दिशा में आगे बढ़ा । आवाज बुलंद हुई । आवाज से पता चला कोई लड़की है । उसने तेजी दिखाई ।
आगे जाकर देखा तो उसके होश उड़ गए । तीन बदमाश लड़की के पीछे पड़े थे । किसी हिरन की तरह लड़की चिल्ला रही थी ।

‘ ओय ! ‘
आवाज सुनकर तीनो बदमाश में भुवन को देखकर जैसे उसे अनदेखा करके लड़की को पकड़कर घसीटने लगे।
भुवन ने फिर से आवाज लगाई !

” ओय , तुम्हारी माँ ने कान नही दिए क्या ? ” भुवन चिल्लाया।
” कान तो है लेकिन लगता है तेरी मा ने तुजे आंखे नही दी । चला जा यहां से वरना मा को याद भी नही कर पायेगा ! “
और बदमाश हंसने लगे।

” अच्छा , तो ये बात है ! ” कहकर भुवन ने जैसे लाठी हाथ मे ली ।

तीनो ने उसे देखकर लड़की को एक ओर धक्का मार दिया और भुवन की ओर झपटे !

भुवन अकेला था । वो तीन ! लेकिन फिर भी अचानक उस घने जंगल मे गांव से दूर लड़ाई जम गई । तीनो के हाथ मे भी लाठियां थी ।

अचानक एक अनजान लड़की के लिए भुवन की लाठी घूमने लगी। किसी चक्र की तरह ! लेकिन वह भी तो इंसान ही था । एक दो लाठी उस पर पड़ गई । फिर भी वह किसी अनजान जनून में लाठी घूमाता गया । तीन बदमाश लाठियों से वार करते गए और आखिर में एक लाठी भुवन के सिर पर लग गई । इस बार वह खड़ा नही हो पाया । धड़ाम से गिर गया। तीनो एक साथ वार करने ही वाले थी कि अचानक से दूर से धूल उड़ती दिखाई दी ।

‘ क्या हुआ ? ‘ एक बदमाश चीख पड़ा । थोड़ी देर बाद गाय ,भैंस , भेड़ का एक पूरा झुंड जैसे दौड़ता आ रहा था । गैया जैसे उनको मारने के लिए ही सिंग उठाकर आ रही थी । तीनो अचानक से आये इस झुंड के कारण हक्का बक्का रह गए । जैसे ही गैया पास आई तीनो भाग खड़े हुए।

भुवन के चारो ओर जैसे दीवार बना ली । मानो कोई सुरक्षा कवच हो । थोड़ी देर बाद सब शांत हो गया । लड़की होश में आई । बेहोश पड़े भुवन और सब गैया व पशुओ को देखा। थोड़ा सा डर लगा लेकिन फिर जब गैया ने कुछ ना किया तो वह भुवन के पास गई । अभी भी भुवन बेहोश था । पत्ती में पानी लेकर आई और भुवन पर छिड़का । भुवन कहरा उठा । उसकी मार अब दर्द कर रही थी । लड़की ने लाठी ले ली और अपने कंधे से भुवन को आधार देकर सब पशुधन के पीछे पीछे चल पड़ी ।

‘ नाम क्या है तुम्हारा ? ” भुवन ने पूछा !
“चंदा ! ” लड़की ने सीधा जवाब दिया ।
‘ क्यो पीछे पड़े थे ? ‘
” मा बाप मर गए तो मुझे और मेरे घर को लूटना चाहते थे ! “
……..

बाते करते करते गांव आ गया । गांव वालों ने भुवन को घायल देखा । कोई खाना , कोई मरहम तो कोई दवाइयां लेकर भुवन के घर आ गया। तनहाई में पड़ा रहता घर जैसे चहक उठा । मरहम पट्टी , दवाई और खाना होने के बाद एक के बाद एक आदमी चला गया । बचे भुवन , चंदा और तन्हाई!

” तुम अंदर सो जाओ ! ‘ कहकर भुवन दरवाजे पर ही लाठी लेकर सो ने तैयारी करने लगा ।
” आप भी आराम ….”
‘ जी , नही ! वो लोग आएंगे जरूर ! पैसे और लड़की ! ऐसे थोड़ी ना छोड़ेंगे ? ‘ कहकर भुवन घर मे पड़े फावड़े , लकड़ियां , चौपाई का बड़ा लकड़ा लेकर दरवाजे पर ही बैठकर जैसे उनका इंतजार करने लगा ।

चंदा जगती हुई सोई । और आखिर में दोनों की आंख लग गई । रात गहरी होती गई और गांव में तीन अनजान साये आये । हाथ मे तलवार और घातक हथियार लेकर भुवन के घर की ओर चल पड़े ।

घर में कोई था नही । अंदर आने के लिए जैसे ही आगे बढ़े एक लाठी घूमती हुई आई और तीन में से किसी एक का सिर फोड़ती हुई उड़ती चली गई ।

जिसे लाठी लगी वह जोर से चिख पड़ा और फिर से भुवन इस बार फावडा और लाठी लेकर दौड़ पड़ा । सामने भी तलवारे चमक उठी । फिर से लड़ाई जम गई । लेकिन इन बार खूनी साबित हुई । भुवन ने दोनों को मार दिया लेकिन उसके पेट मे तलवार लग गई थी ।
चंदा दौड़ी लेकिन तब तक खेल खेला जा चुका था । तीनो बदमाश अलग थलग पड़े थे । भुवन में पेट मे से खून की नदी बहती जा रही थी । जैसे थोड़ी ही देर में आंते बाहर आ जायेगी ।

भुवन गिरा और चंदा ने उसे अपनी गोद मे लेकर जोर से आकाश को चीरने वाली बुहार लगाई । आधी रात में गांव जाग गया । आकर देखा तो भुवन घायल था । वैद राज ने दवाई दी , इलाज किया । लेकिन सुबह होते होते भुवन ठंडा पड़ता गया ।

सुबह जब सूरज बाहर आया तो चंदा ने भुवन को देखा , उसकी आंखें अभी भी नम थी । घर देखकर उसकी हालत समझ गई थी । उसने उसे हिलाया लेकिन अब भुवन वहां था नही !

स्मशान के एक और बदनसीब की आग जल गई । शाम को गांव जैसे बेजुबान होकर बैठा रहा ।

नई सुबह सब गैया , भेड़ , बकरियां इकठा होकर भुवन के घर पर आ गए । सब ने सोचा अब कौन जाएगा ???

धीरे से भुवन के घर का दरवाजा खुला । भुवन के कपड़े पहने चंदा सिर पर कपड़ा डालकर , रोटी का आटा और मिर्च नमक और कंधे पर लाठी लेती हुई बाहर निकली !

‘ हुर्रर्ररर !!!’ कहती चंदा चल पड़ी और पीछे ……..!

पूरा गांव देखता रहा ! गांव के रास्ते से इंसानीयता चली जा रही थी और पीछे गांव की आंखों में से आंसू !!!

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